पूरा समुद्र मेरे पास था, लेकिन फिर भी मैं प्यास से मरता रहा

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Sukhdeep Singh

Sukhdeep Singh

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Passionate about playing with words. Sukhdeep is a Post Graduate in Finance. Besides penning down ideas, he is an expert online marketing consultant and a speaker.

आजकल मैं सुबह की सैर पर नहीं जाता क्योंकि शायद मैंने अपनी सुबह की सैर और सेहत दोनों से समझौता कर लिया है। इन दोनों चीजों को लेकर मैंने आलस को गले लगा है। सच जानिए, जब से मैंने ऐसा करना शुरू किया है, मुझे एक अलग सी खुशी मिलने लगी है। ऐसा नहीं है कि मैं सेहत को लेकर बेपरवाह हो गया हूँ। लेकिन अब मुझे यह समझ आ गया है कि दादा जी मुझे सैर पर क्यों लेकर जाते थे। उनके द्वारा कही गई बातें अब मेरी समझ आ गई हैं और इसलिए मुझे सैर करने का कोई और मुख्य उद्देश्य नजर नहीं आता। पूरा समुद्र मेरे पास था, लेकिन फिर भी मैं प्यास से मरता रहा।

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एक दिल जो कभी प्यार से भरपूर था, कुछ अपनों से मिले धोखों के कारण, इस तरह बिखर गया जैसे समुन्द्र के किनारे रेत से बना किसी बच्चे का मिट्टी का घर। अचानक समुन्द्र के गर्भ से एक राक्षसी लहर उठती है और उस मिट्टी के घर का आखरी निशान तक मिटा देती है।

सारी उम्र में यही सोचता रहा कि हर बार जब भी मैंने सिर उठा कर दो कदम आगे बढ़ने की कोशिश की, तो मेरी बेवफा तक़दीर ने मुझे चार कदम पीछे धकेल दिया और मुझे एक जन्म से अभागे इंसान की तरह अकेला कर दिए। अपने सपनों के इन लुटेरों से मेरा कई बार बहुत करीब से साक्षात्कार हुआ है।

जिंदगी को देखने के नजरिए को ठीक करने की जगह, मैं अपने अंधे विश्वास को मन ही मन और मजबूत करता गया और सोचता रहा कि एक दिन आएगा जब मुझे भी यश मिलेगा और मेरे किए हर काम की प्रशंसा होगी। मैं बेवकूफों की तरह सोचता रहा कि एक दिन उगते सूरज की पहली किरणें मेरे घर की पश्चिमी खिड़की से मेरी माथे पर पड़ेंगी और मेरी भाग्य रेखाओं को बदल देंगी। पर यह, सिर्फ मेरा वहम ही था।

यह जानते हुए भी कि ऐसा कभी नहीं होगा, मैंने अपने पागलपन को जारी रखा और उम्मीद नहीं टूटने दी। यकीन मानिए, जब आप किसी अपने को ही विश्वास की सीमाओं का उल्लंघन करता हुआ देखते हैं, तो बहुत धक्का लगता है। ऐसे में अगर आप दिमाग की जगह दिल से सोचते हैं, तो आपका खुद को संभाल पाना बहुत मुश्किल होता है।

आप शायद नहीं जानते कि बड़े दिल वाले लोग, बड़े दिमाग वाले लोगों के सबसे पसंदीदा खिलौनों में से एक होते हैं क्योंकि इनसे खेलना उनको बहुत अच्छा और फायदेमंद लगता है।

इस क्रूर दुनिया में जीवित रहने के लिए और खुद को प्यास से मरने से बचाने के लिए, हम सभी को दुनियादारी वाले जहर की कुछ बूंदें जरूर चखनी चाहिए।

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पहले-पहले मुझे लगता था कि भगवान मेरे साथ शतरंज खेल रहा है। अपनी हर चाल के बाद वह मुझे गौर से देखता और यह सोचकर मुझ पर हँसता होगा कि अब मैं कौन सी चाल चलूँगा। मुझे महसूस होता था कि वह मुझे आत्मसम्पर्ण के लिए मजबूर करता रहता था।

ऊपर लगी फोटो मुझे अपने बचपन की उस याद में ले जाती है, जो मेरे जीवन का सबसे अच्छा समय था। मैं हर सुबह अपने दादा जी के साथ घूमने जाता था। उनके खुरदरे हाथ, लेकिन मजबूत तर्जनी को पकड़ कर, हमेशा उन्हें समुन्द्र के किनारे की ओर खींचता था क्योंकि सीपियाँ और मोती इकठ्ठे करने में बहुत दिलचस्पी थी।

ओह, मेरी खुदा! मैं ही जानता हूँ कि मैं कितना जिद्दी, बिगड़ैल, शरारती और लापरवाही बच्चा था। अपने दादा जी के जिंदगी भर के अनुभवों से सीखना तो दूर, मैंने कभी उन्हें सुनना भी जरूरी नहीं समझा। मेरे लिए वे बेकार उपदेश थे और वे सब उपदेश पहले ही हर धार्मिक स्थान पर लंगर की तरह मिलते रहते थे। मुझे उनमें सच में कोई दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन, अब मैं जान गया हूँ कि असल मोती तो वह अनुभव थे। इसलिए मैं कहता हूँ कि समुन्द्र मेरे पास था और मैं प्यास से मरता रहा।

कोई जिंदगी जीने के सबसे मूल्यवान अनुभवों को सांझा कर रहा था और मैं मोतियों और सीपियों में उलझा हुआ था।

दादा जी की दो बातें, जो मुझे बहुत देर में समझ आई

मुझे याद है, वह हमेशा कहते थे कि, “काँटों और दुष्ट लोगों से निपटने के दो ही तरीके हैं, या तो उन्हें कुचल दो या उनसे दूर रहो।” दूसरी बात, जो वह हमेशा कहते थे कि, “जब आप आग, सांप, राजा, मादा और मूर्ख के साथ व्यवहार कर रहे हैं, तो आपको अतिरिक्त सावधानी से काम लेना चाहिए क्योंकि यह पांच चीजें जब चाहे आपको बर्बाद कर सकती है।

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अब, मुझे लगता है कि इन्ही दो अनुभवों को अपने जीवन में शामिल न करने की वजह से से मैं अब तक बर्बाद हो रहा था और शायद इन्ही के कारण मैं एक अभागे व्यक्ति सा महसूस करता रहा। दादा जी मुझे बताते थे कि किस तरह मुझे समुन्द्र के किनारे की तरह शांत रहना चाहिए। यह एक कड़वी सच्चाई है कि “अनुकूल समय में, एक व्यक्ति दुनिया को अपनी औकात बताता है और बुरे वक़्त में वही दुनिया उसे उसकी औकात बताती है।

अब चाहे मेरे आधे से ज्यादा बाल सफेद हो चुके हैं, लेकिन दुनियादारी को लेकर मेरे तर्क स्पष्ट हो चुके हैं। मुझे पता है, जब भी पर्दे के पीछे से कठपुतली की डोर खींची जाएगी, कठपुतली को अपनी स्थिति बदलनी ही होगी। हमारी डोर भी किसी और के हाथ में है। वह अपनी मर्जी से इसे खींचेगा और हमें कुछ से कुछ बना देगा।

लेकिन सब कुछ जानते हुए भी हम लोग उस छोटे बच्चे की तरह बर्ताव करते हैं, जो समुन्द्र के किनारे मिटटी कर घर बनाकर बहुत खुशी और गर्व महसूस करता है। वह इस बात से अनजान है कि समुन्द्र अपने गर्भ में एक विनाशकारी लहर बनाए बैठा है और एक झटके में उसके सपनों के महल को तबाह कर देगा। यकीनन यह भी किसी के हुक्म से ही होगा।

मेरी तरह, यह आपके साथ भी अनगिनत बार हुआ होगा।

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