प्यार निभाना इतना मुश्किल क्यों हो गया है

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Sukhdeep Singh

Sukhdeep Singh

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Passionate about playing with words. Sukhdeep is a Post Graduate in Finance. Besides penning down ideas, he is an expert online marketing consultant and a speaker.

अक्सर लोग मुझसे यह प्रश्न पूछते हैं, आजकल प्यार निभाना इतना मुश्किल क्यों हो गया है? चाहे बात भाई-बहनों में प्यार की हो या प्रियजनों में, रिश्ते पहेलियां बनते जा रहे हैं। शायद किसी ने सच ही कहा है कि असली प्यार केवल किताबों और कहानियों की बात है?

जिस गति से हम भौतिकवाद की और बढ़ रहें हैं, मुझे डर है कि सयुंक्त परिवार की तरह एकल परिवार भी खत्म हो जाएंगे। आने वाले कुछ समय में, पश्चिमी देशों की तरह हमारे देश में भी अकेलेपन के मरीज़ों में वृद्धि होना तय है। जहाँ एक ओर पश्चिमी देश हमारी सभ्यता के कायल होते जा रहें हैं, वहीं बहुत शर्म से कहना पड़ रहा है कि हम उसी सभ्यता का आए दिन बलात्कार करने पर तुले हुए हैं। निजी स्वार्थ, जूठी प्रतिष्ठा, दिखावा, लालच, ईर्ष्या, द्वेष, जातिवाद, और पाखंड जैसी घटिया चीज़ों को हमने अपनी ज़िन्दगी का आधार बना लिया है। ऐसे हालातों में सच्चे प्यार की बात करना और उसे निभाने की उम्मीद करना, मूर्खता के आलावा कुछ नहीं है।

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इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश में हर घर में सुबह की शुरुआत धार्मिक ग्रंथों के श्लोकों पर विचारों से होती है। सुबह के 2 से 3 घंटे, हम सबके घरों, दफ्तरों, गाड़ियों, बसों, दुकानों और सड़कों पर भजन कीर्तन ही सुनाई देते हैं। अगर कोई विदेशी हमारे घरों या गलियों के आगे से गुज़रे, तो उसे लगेगा भारतीय लोग कितने पवित्र हैं। परन्तु, जैसे ही दिन आगे बढ़ता है, हमसे बहुत लोग अपने असली रूप में आ जाते हैं। चोरी, ठगी, बेईमानी, कामचोरी, घटिया मानस्किता के शिकार मरीज़ों की तरह, हम अपने अंदर छुपे जानवर का खुल कर दिखावा करने लगते हैं।

दिखावा करने में, हम लोगों ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। चाहे धर्म-कर्म हो या फिर रिश्ते, जो जितना दोगला है, उसका दिखावा उतना ही अधिक है। कभी-कभी तो लगता है कि हमसे अच्छा तो वह नास्तिक और घटिया इंसान ही हैं(है), जो दिखावा नहीं करता और जैसा है वैसा दिखता भी है। मैं खुद ऐसे अनेकों लोगों से मिल चूका हूँ, जो दिखावे में इतने निपुण होते हैं कि उन्हें देखकर इंसान तो क्या बड़े-बड़े विद्वान् भी धोखा खा जाएँ। भगवान से प्यार उनके लिए एक रोज़गार से ज़्यादा कुछ नहीं है। ऐसे में जब लालच और स्वार्थ से भरी आँखें मंदिरों या मस्जिदों को नहीं छोड़ती, तो वहां सच्चे प्यार की तो बात ही नहीं रह जाती।

भाई-बहनों में भी अब वह पहले जैसा प्यार देखने को नहीं मिलता। हम सब ने अपनी ज़रूरतों को इस कदर बढ़ा लिया है कि भाई-बहन के प्यार में मज़बूती दुआओं पर नहीं, बल्कि जायदाद के बटवारे पर निर्भर करती है। रक्षा-बंधन हो, या कोई और भाई-बहन से जुड़ा त्यौहार, जहाँ रेशम के धागों की जगह सोने-चांदी से बने बाजूबंदों ने ले ली है, वहीं प्यार और विश्वास की जगह कीमती तोहफों ने बदल दी है। ऐसा नहीं है कि सभी भाई-बहनों में यह रिश्ता भौतिक हो गया है, परन्तु ज़्यादातर मामलों में यही सचाई है। जितना बढ़ा और महंगा तोहफ़ा, उतनी बढ़ी दुआ।

आइए, अब पति-पत्नी या प्रेमिका के साथ प्रेम के बारे में बात करते हैं। यह रिश्ता भी भौतिकवाद का पूरी तरह से शिकार हो चूका है। ज़्यादातर रिश्तों के टूटने का कारण भौतिक ज़रूरतों का पूरा न होना ही होता है। आजकल प्यार निभाना इतना मुश्किल इस लिए भी हो गया है क्योंकि हम लोगों में नैतिकता की भरपूर कमी हो रही है। चाहे आदमी हो या औरत, विश्वासघात, लालच, धोखा, फरेब, हवस, और स्वार्थ, हम सब पर हावी है।

नाज़ायज़ संबंधों में औरतें किसी भी लिहाज़ से मर्दों से कम नहीं हैं। दहेज़ उत्पीड़न के फ़र्ज़ी मामले हों या बलात्कार के झूठे मुकदमे, औरतों ने भी सभी हदें पार कर दी हैं। औरतों ने भी महिला सशक्तिकरण का दुरपयोग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बहुत से पुरषों ने इन झूठे मुकदमों के चलते अपनी जान तक गवाई है। कई मामलों में, यह भी देखा गया है कि किसी रिश्ते में जब चीज़े सोच से विपरीत चली जाती हैं, तो आपसी शारीरिक संबंधों को शारीरिक शोषण के प्रमाण के रूप में उपयोग किया जाता है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सभी मामले झूठे हैं, लेकिन कुछ अवसरवादी महिलाओं की वजह से अन्य जरूरतमंद महिलाओं को भुगतना पड़ता है।

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मर्दों की नैतिकता में भी गिरावट बढ़ती ही जा रही है। कुछ मर्द पत्नी के होते हुए भी किसी गैर स्त्री के सम्बन्ध बनाने में कोई गुरेज़ महसूस नहीं करते, बल्कि मर्दानगी मानते हैं। कुछ महिलाओं द्वारा अक्सर यह कहा किया जाता है कि उनका प्रेमी शारीरिक संबंध बनाने के लिए उन पर दबाव डालता रहता है। उनके प्रेमी, यौन-संबंध बनाने के लिए उनको इमोशनल ब्लैकमेल भी करते हैं और उनकी बात न माने जाने पर उनको बदनाम करने की धमकियां भी देने लगते हैं। शर्म की बात है लेकिन बहुत से पुरुष अपनी चंद मिनटों की कामुकता को शांत करने के लिए, किसी लड़की के जीवन से खिलवाड़ करने से ज़रा भी परहेज़ नहीं करते। मैं इन नामर्दों को मर्द तो हरगिज़ नहीं मानता। क्या घटियापन और मर्दानगी के बीच के अंतर को समझना इतना कठिन है?

जाति के नाम पर प्यार करने वालों की जान लेना, हमारे देश में गर्व की बात मानी जाती है। सबसे बड़ी दुःख की बात यह है कि ऐसा करने वाले खुद को अपनी जाति का रक्षक मानते हैं और ऐसा करके वह अपनी जाति के प्रति प्यार का सबुत देते हैं। कड़वा है, लेकिन सच है कि भारत के बहुत हिस्सों में आज भी इंसानों की पहचान उनकी जाति से की जाती है। एक तरफ हम समानता की बात करने का पाखंड करते हैं, वहीं दूसरी तरफ हम से बहुत लोग उच्च जाति के होने का ढोल भी पीटते रहते हैं। यह जानते हुए भी उच्च या नीच जाति में जन्म लेना किसी का निजी फैसला नहीं होता, हम इंसानों को भेड़-बकरियों की तरह मारते-काटते रहते हैं। हम आरक्षण को ख़त्म करने के लिए आतुर हैं, लेकिन आरक्षण की वजह (जाति) को नहीं। ऐसी परिस्थिति में सच्चे प्यार को निभाने की बात किसी मज़ाक से कम नहीं लगती।

अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि प्यार निभाना इतना कठिन नहीं है, जितना प्यार निभाने के लिए अपनी सड़ चुकी मानसिकता में परिवर्तन लाना है। प्यार चाहे भगवान से हो या इंसान से, जब तक हम सोच नहीं बदलेंगे, तब तक यह सिर्फ दिखावा ही है। हमें सही मूल्यों की पहचान करना बहुत ज़रूरी है। प्यार में पैसा या भौतिक चीज़ों के आदान प्रदान की कोई अहमियत नहीं होती और न ही प्यार में नफरत के लिए कोई जगह होती है।

प्यार एक ऐसा अहसास है, जो केवल तभी महसूस किया जा सकता है, जब धार्मिक किताबों के श्लोकों को न सिर्फ सही तरीके से समझा जाए, बल्कि उनके अर्थों को अमल में भी लाया जाए।