ससुराल से संबंध | सुसराल वालों की दखलंदाजी से कैसे निपटें

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Photo Credit: bluelotus92 via Foter.com / CC BY-SA
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Sukhdeep Singh

Sukhdeep Singh

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Passionate about playing with words. Sukhdeep is a Post Graduate in Finance. Besides penning down ideas, he is an expert online marketing consultant and a speaker.

शुक्रवार की शाम थी। ऑफिस खत्म करने पर) मैं सीधा बस-स्टैंड पहुँचा और अपनी बुकिंग के हिसाब से बस में अपनी सीट पर जा बैठा। मुझे घर पहुँचने में अभी 4 घंटे का सफर तय करना है, मैंने सोचा कि हेडफोन निकाल कर मोबाइल फोन पर गाने इत्यादि सुने जाएं। लेकिन, मेरे फोन की बैटरी सिर्फ 2% ही बची थी और मैं नहीं चाहता था कि घर पहुँचने से पहले यह खत्म हो। खैर, अब मेरे पास कोई चारा नहीं बचा था, सिवाय आस पास के लोगों की बातें सुनने के।

अभी बस चली ही थी कि मेरे सामने वाली सीट पर दो अधेड़ उम्र की महिलाएं आ बैठी थी। आदतानुसार उन्होंने अपनी बेटी, दामाद और बहू की बातें शुरू कर दी।

एक महिला ने दूसरी से पूछा, “तुम्हारी बेटी कैसी है? शादी के बाद खुश तो है?”

दूसरी ने जवाब दिया, “मेरी बेटी बहुत भाग्यशाली है। मेरा दामाद बहुत ही विनम्र है और मेरी बेटी की हर इच्छा पूरी करता है।

उसी महिला ने दूसरा सवाल किया, “सुना था कि तुम्हारे बेटे ने भी शादी कर ली है? तुम्हारी बहू कैसी है?”

इस पर महिला बोली, शादी के बाद मेरा बेटा तो बिल्कुल निकम्मा हो गया है। वह पूरी तरह से जोरू का गुलाम हो चुका है। जो मेरी बहू कहती है, वही करता है। हर छोटी-से-छोटी चीज जैसे कि कौन सी कमीज पहनी जाए, किस रंग के कपडे ख़रीदे जाएं इत्यादि, सब बहू के हिसाब से करता है और मुझे तो पूछता भी नहीं है।

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उसके जवाब सुनकर मैं सोच रहा था कि दोनों जवाबों में स्थिति एक जैसे ही है अर्थात पति अपनी पत्नी का पूरा ध्यान रख रहा है। फिर भी, अगर बेटा करे, तो जोरू का गुलाम है और अगर दामाद करे, तो भगवान है।

मैं उनकी रूढ़िवादी सोच और दोहरी विचारधारा पर अंदर ही अंदर हस रहा था। उनका यह बहू और बेटे को कोसने का सिलसिला चलता रहा। इसी बीच मेरा मुकाम आ गया और मैं बस से उतर कर अपने घर की ओर जाने लगा।

सारी रात मैं सोचता रहा कि कितना आसान था उन दोनों महिलाओं के लिए यह कह देना कि सारा कसूर उनकी बहू और बेटे का ही है। उन्होंने एक बार भी अपने बेटे और बहू के दिल में झाँकने की कोशिश भी नहीं की।

अपनी बहू और बेटी दोनों के लिए अलग-अलग मापदंड क्यों हैं? इसी के साथ मैं यह सोच रहा था कि आजकल वृद्ध आश्रमों की संख्या इतनी क्यों बढ़ रही है। कुछ लोगों के लिए अपने ही घर में उन्ही लोगों के साथ रहना इतना मुश्किल कैसे हो जाता है, जिनके साथ उसने उम्र गुजारी हो? यह सवाल ही बना रहता है कि कौन किस को घर से निकालना चाहता है। इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए मैं अपने दादा जी के पास पहुंचा।

कथनी और करनी में फर्क है

मेरे दादा ने मुझे बताया कि, इस दोहरे मापदंड और बिगड़े हुए समाज के लिए हर क्षेत्र में होने वाला बदलाव जिम्मेदार है। तुम जितना ज्ञान हासिल करोगे, उतने ही मुर्ख होते जाओगे। उन्होंने मुझे कहा कि मेरी उम्र के लोग लिंग समानता, ईमानदारी, विश्वास, प्यार, बुजुर्गों के प्रति सम्मान, एकता और लालच के बारे में बहुत बातें करते हैं, लेकिन सिर्फ बातें ही करते हैं, अमल नहीं।

अगर मेरी उम्र का कोई भी इंसान आपसे अपने विचार सांझे करना चाहे, तो तुम्हारी उम्र के लोग यह कहकर टाल देते हैं कि हमारी बातें रूढ़िवादी हैं अर्थात पुराने ख्यालों वाली हैं। मैं औरत या मर्द, किसी की भी आज़ादी के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन असल में यह जरूरत से ज्यादा आज़ादी ही हर फसाद की जड़ है

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अगर कोई लड़का अपने बूढ़े माँ-बाप को छोड़कर कहीं और रहने चला जाता है, तो हम उस लड़के का ही कसूर निकालते हैं। मैं पूछता हूँ कि अगर उस लड़के ने माँ-बाप को छोड़ना ही था, तो उसे शादी तक रुकने की क्या जरूरत थी? पहले ही क्यों नहीं छोड़ दिया? विवाह के कुछ महीनों बाद, एक जिम्मेदार बेटा अचानक घमंडी, गैर जिम्मेदार और एहसान फरामोश बन जाता है।

दोहरे मापदंड वाले लोग हमेशा दुखी ही रहते हैं

लड़के के लिए दुविधा यह है कि अगर वह अपनी पत्नी की सुने तो, समाज उसे “जोरू का गुलाम” कहता है। इसके उल्ट, अगर माँ-बाप की सुने, तो माँ-बाप का लाडला और पत्नी का दुश्मन कहलाता है।

इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि दोनों ही मामलों में बेटे के कौन सा प्रमाणपत्र जारी होगा, यह भी एक औरत के रूप में या तो उसकी बीवी तय करेगी या फिर माँ। मेरे दादा जी ने कहा, उन्होंने अपनी सारी उम्र में इस विषय पर किसी मर्द को बहस करते नहीं सुना।

तो, इसका हल क्या है दादा जी?

इसका बहुत ही साधारण सा हल है। तुम्हारी उम्र के लोगों को औरत और मर्द की बराबरी पर लेक्चर देने की जगह, नैतिक कीमतों पर बात करने की जरूरत है।

दूसरों के साथ वैसे व्यवहार करें जैसा आप चाहते हैं कि वह आपसे करें

एक सास होने के नाते, अगर मैं चाहती हूँ कि मेरी बहू मेरी बेटी की तरह रहे, तो पहले मुझे उसकी माँ बनना होगा। वहीं, दूसरी तरह अगर बहू होने के नाते मैं यह चाहती हूँ कि मेरी सास मुझसे अपनी बेटी जैसा बर्ताव करे, तो पहले मुझे अपनी सास को माँ की तरह देखना होगा।

अपनी बात को समझाने के लिए मैं तुमको एक आसान सा उदाहरण देता हूँ। आज ही जाकर देखना कि तुम्हारी बीवी जब अपनी माँ से फोन पर बात करती है, तो कितनी देर करती है और जब तुम्हारी माँ यानी कि अपनी सास से करती है, तो कितनी देर करती है। मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि तुम्हारी माँ से महीने में एक-आध बार और वह भी 10 मिनट से ज्यादा नहीं करती होगी। दूसरी ओर, अपनी माँ से , लगभग रोजाना और वह भी घंटों।

यह हाल तुम्हारी माँ का भी होगा। अपनी बेटी से उसकी रोज़ घंटों तक बात होती होगी, और तुम्हारी पत्नी से, महीने में एक बार और वह भी कुछ मिनटों के लिए। तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूँ कि तुम्हारी बहन की सास भी इसी समस्या से परेशान होगी कि उसकी बहू उससे इतनी बात नहीं करती, जितनी वह खुद की माँ से करती है।

कुछ लड़कियों के लिए चीजों को बाँटना एक चुनौती से कम नहीं है

तुमने मुझे एक दफा बताया था कि जब तुम अपनी ग्रेजुएशन के लिए शहर से बाहर रहते थे, तो आठ लड़के एक ही घर में रहते थे। तुम्हारे मुंह से मैंने कभी नहीं सुना कि तुम लड़कों के बीच चीजों को बांटने में कोई समस्या आई हो। क्या तुम ऐसा कोई भी उदाहरण लड़कियों के बारे में दे सकते हो?

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लड़कियों के लिए चीजों को बाँटना एक चुनौती से कम नहीं है। मैं सब की बात नहीं कर रहा, लेकिन कुछ लड़कों की तरह लड़कियों में भी चीजों को न बाँटने की आदत होती है। कुछ लड़कियों के लिए, चाहे कोई छोटी सी चीज जैसे कि जीन्स, टी-शर्ट, जूते, रसोई का सामान, या फिर सिर की कंघी इत्यादि ही क्यों न हो, बांटना मतलब अपने शरीर का कोई हिस्सा देने जैसा है। शायद उनकी यही आदत, उनको आगे चलकर परेशान करती है। जो औरत अपना कंघी तक नहीं बाँट सकती, वह अपने बेटे का ध्यान बाँटने को तैयार हो जाएगी, इस बात की उम्मीद करना ही व्यर्थ है।

मेरे दादा की कही हर बात, मेरे दिमाग पर गहरा असर छोड़ रही थी। मानो उनकी हर बात जैसे कोई कड़वा सच हो।

एक दखल देने वाली सास से निपटना

उन्होंने मुझे बताया कि, तुम्हारी उम्र के लड़कों का जब विवाह होता है, तो विवाह के बाद, बहू के ससुराल वालों की तरफ से लड़के के पारिवारिक फैसलों में दखल देने की आदत को भी वह समझ नहीं पाए हैं। उनके मुताबिक, जब उनकी शादी हुई थी, तो दादी के उनके घर में आने के बाद, दादी के माता-पिता का उनके घर के मामलों में कोई दखल नहीं था और उन्हें इस बात की इजाजत भी नहीं थी कि वह कोई सलाह दे सकें।

दादा जी के मुताबिक, वह यह समझ ही नहीं पाते कि आज कल की बहुओं के माताओं को चिंता किस चीज़ की रहती है? यह देखने के बाद भी की बेटी कुशल-मंगल है और अपने पति के घर में सुखी है, उनके दिन में 5-5 बार फोन पर बात करने की वजह क्या है? क्यों उनको अपनी बेटी के घर का हर छोटा-बड़ा राज जानना है? क्यों वह अपनी ही बेटी को उसके सुसराल का जासूस बनने पर मजबूर कर देते हैं? जासूस बनने के बाद, यही बहुएं अपनी माताओं से अपने ससुराल की हर छोटी-बड़ी बात सांझी करती हैं, बस अपनी गलतिओं को छोड़कर।

यही बस नहीं। अपनी बेटी की इस मूर्खता को सुझवानों की तरह सुलझाने की बजाय, माताएं उनको और उल्टी सलाहें देती हैं। वह अपने शैतानी दिमाग से उनको जवाबी कार्यवाही करने के लिए उकसाती हैं। यह जानते हुए भी, ऐसा करके वह अपनी बेटी का घर ही खराब कर रही हैं, वह कोई कसर नहीं छोड़ती। उनके लिए यह आत्मसम्मान का विषय बन जाता है और किसी भी कीमत पर इसे जीतना चाहती हैं। उनके मुताबिक, दिल खोलकर जहर उगलना ही सही है।

दादा जी ने हँसते हुए कहा कि हमारे ज़माने में “हम लोग और बुनियाद” जैसे टीवी धारावाहिक होते थे। शायद इसी वजह से परिवार जुड़े रहते थे। तुम्हारी उम्र में सास बहू की राजनीति वाले नाटक होते हैं, इसलिए घर में वही सब कुछ चलता रहता है।

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पति जो मर्दों की तरह अपने फैसले पर खड़े नहीं होते हैं, अक्सर अपनी शादीशुदा जिंदगी को तबाह कर बैठते हैं

अगर मर्दों की बात करूँ, तो वह भी इस समस्या के लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। मुझे यह समझ नहीं आता कि सारा-सारा दिन जिम में बैठे रहने वाले तुम लड़के, इन मुद्दों पर कोई कठोर फैसला लेने से इतना डरते क्यों हों(हो)? अगर तुम्हारी माँ ने तुम्हारी बीवी से कुछ कहा है, तो तुम हर बार उसे मामूली बात कहकर टाल क्यों देते हो? हो सकता है कि वह बात तुम्हारे लिए मामूली हो, लेकिन तुम्हारी बीवी के लिए न हो?

मेरे हिसाब से अब हमें इस धारणा को भी बदलना होगा कि माता-पिता हमेशा सही होते हैं। अपनी बीवी की तकलीफों को नजरअंदाज मत करो और अगर करते हो, तो उसके उसकी माँ और भाइयों से बात करने पर परेशान होना बंद करो। आखिर, उसे भी कोई चाहिए, जिससे वह अपनी बात कह सके।

ज्यादातर मामलों में, बात सिर्फ इस लिए बिगड़ जाती है क्योंकि दूसरे का पक्ष सुना ही नहीं जाता और फैसला सुना दिया जाता है। जब सचाई सामने आती है, तो झूठा व्यक्ति हमेशा यही कहता है कि मैंने तो वैसे ही कहा था, उसने तो वैसे ही राई का पहाड़ बना दिया।

क्या इस विषय में आपका कोई प्रश्न हैं ? हमारे विशेषज्ञ से ज़रूर पूंछे।

हमेशा याद रखो कि बिना आग के धुआँ नहीं होता। अगर किसी ने कुछ कहा है, तो उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। चुनौती है – सही कसूरवार को बेनकाब करना और मुद्दे को हल करना। “बैठो और बात करो। और जो इसके लिए तैयार नहीं है, उसे छोड़ दो।

एक आखिरी सुनहरा नियम – अपनी मां और सास को कठोर शब्दों में कह दें कि आपके और आपकी पत्नी के मामलों में हस्तक्षेप न करें।

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