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आख़िरकार मैंने खुद को पैसे के लिए बेच ही दिया

- एक सच्ची कहानी पर आधारित -

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खुद को पैसे के लिए बेच
Finally! I Sold Myself For Money
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जो लोग कहते हैं कि वेश्यावृत्ति पैसा बनाने का एक आसान तरीका है, मैं उन्हें बताना चाहूँगी कि पैसे के लिए किसी के साथ सोने का निर्णय लेना, मेरे लिए आसान नहीं था।

किसी शायर ने ठीक ही कहा है कि ज़िंदगी बेवफा है। ऐसे में, जब चीजें सीधी दिशा में नहीं जा रही होती, तो हमें ही उल्टी दिशा में जाना पड़ता है। क्या आपने कभी नोट किया है, जब भी हमें लगता है कि हम सातवें आसमान पर उड़ रहे हैं, तभी बादलों में से कोई अदृश्य हाथ निकलता है और हमारे मुंह पर ऐसा करारा तमाचा रसीद करता है कि हमारी अकल ठिकाने आ जाती है और हम वास्तविकता की ज़मीन पर लौट आते हैं। मेरी ज़िंदगी में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। जब मेरे ख्यालों का जहाज़ हवा में उड़ता-उड़ता एकदम धरती पर गिरा, तो मैंने खुद को किसी अजनबी के साथ बिस्तर में पाया। आख़िरकार, मैंने पैसे के लिए खुद को बेच ही दिया।

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जून 2008 का वह दिन। किसी भी अन्य लड़की की तरह, मैं भी अपनी शादी को लेकर बहुत खुश थी। हालांकि, यह शादी सिर्फ कागज़ों में की गई थी क्योंकि मुझे अपना घर बचाना था और किसी को विदेश जाना था। अपने पिता की मौत और भाई के नशों की गुमनामी में खोने के बाद, पिता द्वारा लिए गए कर्ज लौटाने के लिए मेरे सामने दो ही विकल्प थे। पहला यह कि एक दौलतमंद परिवार के लड़के से झूठी शादी करके उसको स्पाउस वीसा पर ऑस्ट्रेलिया ले जाना और दूसरा यह कि एक ऐसे आदमी से शादी करना जिसकी बीवी की हाल ही में मौत हो गई थी और उसके दो बच्चे भी थे। दोनों में से, मैंने पहले विकल्प को चुना और अमीर घर के लड़के से झूठी शादी करके उसके साथ ऑस्ट्रेलिया जाना बेहतर समझा।

मैं खुश थी क्योंकि मुझे एक सुन्दर भविष्य नजर आ रहा था। मुझे इसी बात की ख़ुशी थी कि भले झूठी ही सही, लेकिन शादी के बाद मुझे अपने पति के साथ ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में बसने का मौका मिल रहा है। मुझे अपनी सभी समस्याओं का हल दिखने लगा था और इस बात के लिए मैं अपने होने वाले पति की कर्ज़दार हो चुकी थी। शादी से कुछ रोज़ पहले मुझे पता लगा कि मेरा होने वाला पति नशेड़ी है। लेकिन, क्योंकि मैं मन ही मन में ऑस्ट्रेलिया जैसे देश के सपने बुन चुकी थी, तो मैंने इस बात को नज़रअंदाज़ करके उससे शादी कर ली।

फिर वो दिन भी आया जब मैंने और मेरे पति ने शादी के बाद ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए प्रस्थान किया। भले ही, ऑस्ट्रेलिया जाने की ख़ुशी को मैं संभाल नहीं पा रही थी, लेकिन दूसरी ओर मुझे अपनी माँ के अकेले और बेसहारा होना का गम भी था। उसे अकेला छोड़ कर जाना मेरे लिए आसान नहीं था। मैं अपनी माँ की सेहत के बारे बहुत चिंतित थी।

इन सब ख्यालों की उधेड़बून्ध के साथ ही, जहाज़ ऑस्ट्रेलिया के शहर मेलबोर्न के तुलामरीन एयरपोर्ट पर उतरा। मेरे पति के जीजा हमें एयरपोर्ट पर लेने आए थे। कस्टम की जांच के बाद, मैं अपने पति एवं उसके जीजा के साथ गाड़ी में बैठ गई और हम सब मेरे पति की बहन के घर की ओर जाने लगे।

मैं गगनचुम्बी इमारतों को देख रही था। पहली बार, मैंने महसूस किया कि मेरे पति मेरे पास नहीं बैठे थे। फिर मुझे लगा कि शायद वह भी मेरी तरह ऑस्ट्रेलिया के मन मोहक नज़ारों का आनंद ले रहें हैं। कई हाइवेज और फ़्रीवेज़ को पार करने के बाद, हम अपनी मंजिल तक पहुँच गए – नोबल पार्क (मेलबोर्न में एक उप-नगर का नाम)। घर पहुँचते ही मैंने पाया कि हमारे लिए कोई विशेष स्वागत नहीं था।

“हम सुबह बात करते हैं।” यह वजह पहले पांच शब्द थे, जो मेरी भाभी के मुँह से निकले। रात का खाना खाने के बाद हम सभी अपने कमरों में चले गए।

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इतने असभ्य स्वागत के बाद, मैं अपनी माँ को याद करने लगी थी। मैं उससे बात करना चाहती था। मैंने अपने पति से पूछा कि क्या वह मेरी माँ से मेरी बात करवा सकते हैं। “क्या तुम पागल हो? अब बहुत देर हो चुकी है। मैं दीदी से इस विषय में अभी बात नहीं कर सकता। उन्हें सुबह काम पर जाना है, इसलिए हमें उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए। मैं कल सुबह कोई न कोई इंतज़ाम कर दूँगा। ”बहुत ही भारी मन से मैंने सोने की कोशिश की।”

ऑस्ट्रेलिया में पहला दिन और मैं पहले से ही रो रहा था। मैंने अपने आँसुओं को अपनी पलकों के पीछे छुपाने की बहुत कोशिश की, लेकिन मैं असफल रही। सुबह उठी तो, मेरे तकिये का एक किनारा गीला था। मेरे जीवन में पहली बार, मुझे ऐसा लगा कि मैंने इस लड़के से शादी करके गलत विकल्प का चयन किया है।
अगली सुबह, जब मैं उठी तो कमरे में कोई नहीं था। सुबह के 11 बज रहे थे। मैं ड्राइंग रूम की ओर बढ़ी। मेरे पति घर पर नहीं थे। उनकी बहन और जीजा शायद मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे।

“तैयार हो जाओ! हमने तुम्हारे लिए टैक्सी बुक कर दी है। तुम अपने नए स्थान पर जा रही हो क्योंकि तुम हमारे साथ यहां नहीं रह सकती। यह मेरी मेरी भाभी की मेरे साथ दूसरी बातचीत थी।

मैं पूरी तरह से सदमे में थी।

“ठीक है! मेरे पति के वापस आने का इंतज़ार करते हैं,” मैंने हिम्मत करके अपनी भाभी से कहा।

इस पर भाभी ने कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि वैसे भी तुम्हारा पति तुम्हारे साथ जाने वाला नहीं है। वह दूसरे राज्य में चला गया है। तुम दोनों की शादी सिर्फ कागजी शादी थी और कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार, जब तुम्हारी फीस का समय आएगा, तो तुम यहाँ आ सकती हो और वह आज से 20 दिनों के बाद है। तब तक के लिए अलविदा। और जहाँ भी रहो ठीक से रहो। हमने आपके लिए रहने की जगह का इंतज़ाम कर दिया है और शायद इससे ज्यादा अब हम कुछ नहीं कर सकते। उन्होंने मुझे कोई फोन नंबर देने से भी इनकार कर दिया।

मुझे ऐसी किसी भी शर्त के बारे में कभी नहीं बताया गया था। न चाहते हुए भी, मैंने वह घर छोड़ दिया।

जिस घर में उन्होंने मेरे रहने का प्रबंध किया था, वह बुरी तरह से गड़बड़ था। मुझे जिन लड़कियों के साथ रहने के लिए कहा गया था, वे सभी पैसे के लिए अपना शरीर बेच रही थीं। मेरे लिए यह बहुत घृणित था। लेकिन, फिर मैंने सोचा कि कोई क्या करता है, इससे मुझे कोई सरोकार नहीं होना चाहिए।

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20 दिनों के बाद, जब मैंने फीस के लिए अपनी भाभी से संपर्क किया, तो मेरे मुंह पर एक और ज़ोरदार थप्पड़ पड़ा। “जब से आप लोग आएं हैं, मेरी तुम्हारे पति अर्थात अपने भाई से कोई बात नहीं हुई और फीस के नाम पर उसने हमे एक फूटी-कौड़ी भी नहीं दी है। इसलिए, तुम्हें अपनी फीस की व्यवस्था खुद से ही करनी होगी। और, कृपया, दो महीने तक हमें फ़ोन न करना क्योंकि हम न्यूज़ीलैंड जा रहें हैं।

मैं 4500 ऑस्ट्रेलियन डॉलर कैसे जुटाऊंगी ? मेरे पास तो एक भी रुपया नहीं था। उसी दिन, मेरे साथ रहने वाली लड़कियों ने मुझ से किराने (जो कि मैंने सिर्फ एक दिन ही खाया था) और घर के किराए में मेरे हिस्से के 650 ऑस्ट्रेलियन डॉलर माँगें। मेरे पास सिर्फ 200 ऑस्ट्रेलियन डॉलर था। पूरा 200 ऑस्ट्रेलियन डॉलर देने के बाद भी, उन लड़कियों ने मेरा सामान बाहर फेंक दिया। मैं सड़क पर थी।

रात के 11 बजे थे और पापा की नन्ही परी एक अनजान शहर के अनजान रेलवे स्टेशन पर भूखी, प्यासी, बेघर, निराश और उदास बैठी थी।

मैंने खुद को संभाला और अपनी माँ को फोन लगाया। इससे पहले कि मैं उसे अपनी तकलीफ़ बता पाती, उसने मुझे बताया कि पुलिस ने मेरे भाई को गिरफ्तार कर लिया गया है और छोड़ने के लिए 15000 रुपए (लगभग 300 ऑस्ट्रेलियन डॉलर) की मांग की है। बैंक के लोग पहले ही घर को नीलामी करने की सूचना दे चुके हैं, अगर हमने 18000 रूपये (लगभग 350 ऑस्ट्रेलियन डॉलर) की दूसरी किस्त न दी, तो वह नीलामी कर देंगे। अपनी माँ को रोता हुआ सुनने के बाद, मैं अपने दर्द को पी गई और इसे अपने अंदर ही दफ़न कर लिया।
तुम चिंता मत करो माँ। मैं हूँ न। मैं देखती मैं हूँ कि क्या हो सकता है।

एक रात में, मैं खुद को कर्ज के नीचे दबा महसूस कर रही थी। लेकिन, 1500 ऑस्ट्रेलियन डॉलर मेरी तत्काल आवश्यकता थी। इस पराए देश में ऐसा कोई नहीं था जिससे मैं कुछ पैसे उधार मांग सकती। फिर मैंने अपना फ़ोन निकाला और एक वेबसाइट पर संदेश पोस्ट किया कि “ऋण की आवश्यकता – ऑस्ट्रेलियन डॉलर 1500 – तत्काल।”

संदेश डालने के तुरंत बाद, मुझे इसका जवाब मिला, ” इस राशि के बदले में तुम क्या दे सकती हो?”

मैं पूरी तरह से असमंजस में थी। एक तरफ मेरी गरिमा एवं आत्म-सम्मान का सवाल था और दूसरी तरफ, मेरी माँ के रोने और मेरे भाई के चीखने की आवाज़ मेरे कानों को चीर रही थीं। मैं एक दोराहे पर आ रुकी थी – एक रास्ते पर मेरी हर समस्या का हल था और खुशी की ओर जाता है, लेकिन उसकी कीमत मेरा आत्म-सम्मान था। दूसरा रास्ता आत्म-सम्मान ज़िन्दा रखने का था, लेकिन उसकी कीमत मेरी माँ, भाई की मृत्यु और मेरे अपने घर की नीलामी थी।

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मैंने सोचा, ऐसे आत्म-सम्मान और गरिमा की रक्षा करने का क्या फायदा, जिसको बचाते-बचाते मेरा सब कुछ चला जाएगा। एक पल के लिए मैंने देश छोड़ कर वापिस भारत आने की भी सोची, लेकिन फिर यह ख्याल मन में आने लगा कि वहां जाकर भी बगैर पैसे के क्या होगा। कम से कम, यहां रह कर मैं अधिक पैसा बना सकती हूं और अपनी आर्थिक समस्याओं को जल्दी से ठीक कर सकती हूँ। इसके अलावा, कौन जानता है कि मैं इस पैसे के लिए क्या कर रही हूँ, सिवाए मेरे।

एक लंबे विराम के बाद, मैंने उस संदेश का उत्तर लिखा, “3 घंटे।” आख़िरकार, मैंने खुद को पैसे के लिए बेच दिया।

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