विवेक का बयान – एक साहसिक फैसला जो आपकी ज़िन्दगी बदल दे

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अरसे बाद ही सही, लेकिन उसकी आँखों में आई चमक देखकर मैं यह समझ गया था कि उसने अपनी ज़िन्दगी बदलने वाले साहसिक फैसले पर अम्ल कर लिया था। किसी ने सच ही कहा है कि दूसरों की ख़ुशी के लिए जीने वाला इंसान खुद सबसे ज़्यादा दुखी होता है। मैं जब भी उससे मिलता था, उसे उदास ही देखता था। लेकिन, हर बार उसकी उदासी का कारण, उसके किसी अपने की उदासी होती थी। कुछ महीनों तक उससे मिलने के बाद, मुझे भी यह लगने लगा था कि इस इंसान की ज़िन्दगी में कभी कोई ख़ुशी नहीं आई। मैं हमेशा सोचता था कि जिसने अपनी सारी ज़िन्दगी दूसरों को खुश करने में ही गुज़ार दी हो, ऐसा इंसान दुखी और अकेला कैसे हो सकता है अर्थात उसके आसपास तो उसके शुभचिंतकों की भीड़ होनी चाहिए? पर मैं गलत था। अब उसने अपनी गलती सुधार ली थी।

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विवेक से मेरी पहली मुलाकात एक बिज़नेस डील के दौरान हुई थी। वह एक बहुत ही अच्छी कंपनी में बतौर फील्ड-ऑफिसर नियुक्त था और हमारी कंपनी के प्रोजेक्ट को भी वही देख रहा था। अच्छी पगार, सुन्दर घर, सुशील पत्नी और लायक संतान, उसके पास हर वह चीज़ थी, जो एक इंसान को ख़ुशी देती है। फिर भी, वह खुश नहीं था। जब भी उससे मिलता था, उसके चेहरे पर चिंता ही होती थी।

शुरू-शुरू में, मैं सोचता था कि विवेक बहुत ही नकारात्मक और भ्रमित व्यक्तित्व का इंसान है। मैं डरने लगा था कि इसका यही स्वभाव मेरे प्रोजेक्ट को भी नुकसान करेगा। जो इंसान हमेशा तिलमिलाया सा रहता है, वह काम पर अपना ध्यान कैसे केंद्रित कर पाता होगा। खैर, जैसे-जैसे हमारा प्रोजेक्ट आगे चलता गया और उसके साथ वक़्त गुज़रता गया, मैं उसको समझता गया। विवेक के बारे में, मेरी शुरुआती राय बदलने लगी थी।

विवेक उन चंद लोगों में से एक था, जो दूसरों की ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी ढूंढ़ते हैं। ऐसे लोगों की ज़िन्दगी समझौतों से भरी हुई होती है क्योंकि वह दूसरों की ख़ुशी के लिए खुद की खुशियों का गला घोटने में संकोच नहीं करते। वह कभी भी अपने दिल की बात नहीं कह पाता था। कभी वह इस बात से निराश हो जाता था कि लाख कोशिशों के बाद भी उसे प्रशंसा के दो बोल सुनने को नहीं मिलते थे, और कभी इस बात पर दुखी हो जाता था कि सब कुछ करने के बाद भी उसके अपने उससे खुश ही नहीं होते थे।

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विवेक उन लोगों से अलग था, जिनकी कथनी और करनी में फर्क होता है। अगर वह किसी से जुड़ता था, तो हमेशा दिल से ही जुड़ता था। दिखावे के लिए किसी का साथ निभाना या किसी की हाँ-में-हाँ मिलाना उसका स्वभाव नहीं था। मैं कम-से-कम एक साल तक उसके साथ रहा और उस वक़्त के दौरान मैंने यह महसूस किया कि मार्केटिंग जैसे क्षेत्र से जुड़े होने के बाद भी, वह दिल से सोचने वाले लोगों में से था। हमेशा अपने दिल की सुनता था। जब भी मैं उसे समझाता था कि दुनिया दिल से नहीं, दिमाग से सोचती है, तो वह अक्सर कहा करता था कि दिल से सोच कर ही रिश्ते निभाए जा सकते हैं, दिमाग से तो व्यापार होता है। अब उसे कौन समझाता कि आज कल रिश्ते भी व्यापार की तरह ही हैं।

लेकिन, मेरा मानना है कि अगर आप साफ़ नियत के इंसान हैं, तो कुदरत भी आपका साथ देती है। वह कई बार ऐसे मुश्किल हालात खड़े कर देती है, जो आपके व्यक्तित्व को पूरी तरह से बदल देती है। विवेक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक सड़क हादसे ने उसके दोनों पैर छीन लिए, और उसे लम्बे समय के लिए बिस्तर से बांध दिया था। यही हादसा उसको इस तरह से हिला गया कि उसका दुनिया को देखने का नज़रिया ही बदल गया।

ऐसे हालात में इंसान सिर्फ अपनों से ही उम्मीद रखता है। लेकिन विवेक की बदकिस्मती यही थी कि उसे इस हालत में अकेला छोड़ कर जाने वाले इंसानों में सबसे पहले उसके अपने घर के ही लोग निकले। कुछ अरसे तक उसके अपनों ने उसका साथ दिया, लेकिन जैसे ही घर और दवा के खर्च बढ़ने लगे, उन सब ने भी अपना हाथ पीछे खींचना शुरू कर दिया।

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मैं शुरू में विवेक से काम की वजह से ही जुड़ा था, लेकिन बाद में हम में अच्छी दोस्ती हो गई थी। उस हादसे के बाद, मैंने विवेक की हर संभव मदद करने की कोशिश की। मैंने ही उसे सलाह दी कि वह अपने ज्ञान को बाँटना शुरू करे। विवेक ने मेरी ट्यूशन देने की सलाह मान ली थी।

बाहर के लोगों से उसके सम्बन्ध अच्छे थे, इसलिए पहले-पहले उसे उधार मिलने भी में परेशानी नहीं हुई। फिर एक वक़्त आया, जब उधार मिलनी भी बंद होने लगी। ऐसा होना ही था क्योंकि बुरे वक़्त में जब अपनों ने ही हाथ खींच लिया था, तो किसी बाहर वाले से भी कब तक उम्मीद रखी जा सकती थी।

इसके बाद कर्जदारों ने दरवाज़े पर दस्तक देना शुरू कर दिया। रोज़ कोई न कोई कर्ज़दार, विवेक को उसी के घर पर ज़लील करके चला जाता था। मैं जब भी उसे मिलने जाता था, वह आंसुओं को आँखों के पीछे छुपा लेता था। लेकिन, मैं जानता था कि वह अंदर से टूट चूका है और जब कभी भी दुबारा खड़ा होगा, तो उसके अपने लोगों को ही बहुत नुकसान होगा।

कुछ समय के बाद, उसकी बीवी ने भी तलाक के कागज़ भेज दिए थे। आजकल ऐसे जीवनसाथी का मिलना बहुत मुश्किल है, जो आपकी दुःख की घड़ी में आपके साथ चट्टान की तरह खड़ा रहे। मुझे भी लगने लगा था कि माँ-बाप के अलावा, किसी की औलाद का मल-मूत्र साफ करना हर किसी के बस की बात नहीं। विवेक को जैसे ही तलाक के कागज़ मिले, उसकी जीने की आखरी उम्मीद भी ख़त्म हो गई।

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वह मुझसे हर दूसरे दिन पूछने लगा था कि क्या उसे इच्छा-मृत्यु मिल सकती है? मैं उसे समझाता था कि उसे वापिस खड़ा होना है और वह हो सकता है। उसकी बीवी के वहां से जाने के बाद, मैं रोज़ाना उससे मिलने जाता था। मैंने ही उसके घर की दूसरी मंज़िल एक अधेड़ उम्र की औरत को किराये पर दिलवा दी थी। वह औरत पेशे से नर्स थी। उसे महीने का आधा किराया ही देना होता था, और बाकि आधे किराये के बदले वह विवेक की सेवा करती थी।

इन सब के बीच, विवेक की पत्नी उसे बार-बार तलाक के लिए ज़ोर डालती रहती थी।

अंत में वो दिन आया, जिसका कम-से-कम मुझे बहुत बेसब्री से इंतज़ार था। हम एक धार्मिक समागम से लौट रहे थे, तो विवेक ने मेरी तरफ एक बंद लिफाफा बढ़ाया। उसे खोलते ही मैं हैरान हो गया। उस लिफाफे में विवेक की पत्नी द्वारा भेजे तलाक़ के कागज़ थे, लेकिन आखरी पन्ने पर विवेक ने हस्ताक्षर कर दिए थे।

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इससे पहले की मैं खुद को संभाल पाता, विवेक ने मुझे एक और झटका दिया। उसने एक और लिफाफा मेरी ओर बढ़ाया। उस लिफाफे में, विदेश की एक यूनिवर्सिटी की तरफ से उसे मार्केटिंग के लेक्चरर की नौकरी का प्रस्ताव था। उस पर भी विवेक ने हस्ताक्षर कर दिए थे।

मैं बहुत खुश था कि उसने अपनी ज़िन्दगी को बदलने और दुबारा से खड़े होने का फैसला ले लिया था। आज उसकी आँखों में मैंने वही चमक देखी थी, जो उससे पहली बार मिलने पर देखी थी। अरसे बाद ही सही, लेकिन उसकी आँखों में आई चमक देखकर मैं यह समझ गया था कि उसने अपनी ज़िन्दगी बदलने वाले साहसिक फैसले पर अम्ल कर लिया था।

आजकल विवेक, विदेश की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहा है और उसकी आर्थिक स्थिति पहले से 10 गुणा बढ़िया है। आज उसने ज़िन्दगी को दिमाग से जीना सीख लिया है।

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