उम्मीदें रखना बंद करे – कैसे दुसरो से कम उम्मीदें रखे

मुझे किसी से कोई उम्मीद नहीं। मुझे कोई डर नहीं। मैं आज़ाद हूँ।

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Sukhdeep Singh

Sukhdeep Singh

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Passionate about playing with words. Sukhdeep is a Post Graduate in Finance. Besides penning down ideas, he is an expert online marketing consultant and a speaker.

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मुख्य आकर्षण

  1. कभी किसी से उम्मीदे ना रखे, ताकि आपको चोट ना पहुचे।
  2. कोई भी सर्वोत्तम नहीं होता।
  3. मैं जैसा/ जैसी हूँ, वैसे ही लोगो को पसंद आये।

उम्मीदें निराशा पैदा करती हैं। अगर आपकी खुशियाँ दुसरो पर निर्भर हैं, तो आपको पीड़ा सहन करनी होगी। आपकी ख़ुशी आपकी जिम्मेदारी है।

“मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी। आज मैंने यह जाना की तुम्हारे लिए मैं कितना/कितनी महत्वपूर्ण हूँ।” यह सामान्य बयान हम बार बार दोहराते हैं। जब हमे किसीं ने धोका दिया हो या अनदेखा किया हो। “मुझे हमेशा दुसरो के लिए जीना सिखाया गया था, इसलिए मैं बस ऐसा ही जी रहा था। पर आज जब में अकेला ही समस्याओ से जूझ रहा हूँ, तो कोई मेरा साथ दे नहीं रहा है।”  अगर आप दुसरो से ज्यादा उम्मीदें रखेंगे, आप अपनी एक मुस्कान भी संभाल नहीं  पाएंगे। यह राज  मैंने अपनी आधी जिंदगी बर्बाद करने के बाद सीखा- उम्मीदें ना रखे। हमे लोगो से ज्यादा उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि हम यह नहीं जानते हैं कि क्या कल यही लोग हमारे ऊपर मेहरबान हो जाएंगे या नहीं।

लेकिन दुःख की बात यह है कि, हम हमेशा झूठी उम्मीदों पर जीते हैं। केवल कई निराशाओ के बाद, हम अपने आप को बदलने की जरूरत को सीखते हैं। एक ऐसा बदलाव जिससे हम दुसरो को परखने लगते है, जिससे हम अपनी उम्मीदों में बदलाव ला सकते हैं।

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ज्यादा अपेक्षा रखना मतलब ज्यादा निराशा पाना है। अगर आप उन चीज़ों का इंतज़ार करेंगे, जो आपके पास नहीं या कभी नहीं होगी, तो हाथ में निराशा ही आएगी। यह पूरी तरह से मूर्खता है। हम ऐसे व्यक्तियों से उम्मीदें क्यों रखे, जो अपवादों के साथ रह रहे हैं?  इंसान से किसी भी प्रकार की उम्मीद रखना गलत है क्योंकि, इंसान अपने वर्तन पर नियंत्रण नही ला सकते।

तो इस निरुपयोगी भावना से कैसे दूर रहे? कैसे हम दुसरो से उम्मीदें ना रखे? आइए, इन सरल  नुस्खों  के तरफ देखे जिससे आप अपेक्षाएं रखना कम करना सिखेंगे। आप मुक्त हो जाएंगे और जिंदगी जीते वक्त ज्यादा वास्तव में रहेंगे। यही वक्त है कि आप उम्मीदों को छोड़ दे और एक सच्ची जिंदगी जीये।

उम्मीदें और निर्भरता में फर्क करना सीखे

शायद आप अपने बदकिस्मती के लिए दुसरो को दोषी ठहराते हो, और वो भी चीज़ों को परखे बिना, इतना ही नहीं आप खुद को भी परखना भूल जाते है। जिस प्रकार से आप व्यवहार करते हैं, उसका असर आपके भावनिक अवस्था पर होता है। आप दुसरो पर निर्भर रहते हैं क्योंकि आप उन्हें खुदके कुछ कामो के लिए जिम्मेदार बनाते हैं।

खुश रहना बहुत कठिन है जबकि आपकी ख़ुशी दुसरो पर आधारित है या फिर ऐसा कहा जाए की आप दुसरो से चाहते हैं की वे आपको अच्छा महसूस करवाये। अगर आप खुद को ढीला छोड़ना और उम्मीदों को भूलना सिखेंगे, तो ख़ुशी आपके ही हाथ होगी और इसके लिये सिर्फ आप ही जिम्मेदार होंगे।

ये स्वीकार करे की आप जो देंगे वो आपको हमेशा नहीं मिलेगा

हमे हमेशा ये याद रखना चाहिए की आप जो देते हैं, उसके बदले आप किसी चीज़ की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। फिर भी, अंदर ही अंदर, हम सब को यह इच्छा तो होती ही है, हमे कुछ मिलना चाहिए। इसलिए, हम अपने कार्यो को पुरस्कृत किये जाने की उम्मीद रखते हैं। हम कर्म तो करते है, और कर्म के फल का इंतज़ार भी करते है।

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इसी प्रकार, हम अपनी उम्मीदों को प्राथमिकता देने लगते हैं। आप लोगो को वे जैसे हैं, वैसे ही स्वीकार करे, और ये समझने की कोशिश करे की हर कोई आपके उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकता। बुरा ना माने। बस ख़ुशी इस बात की माने की आप दुसरो को कुछ देने में सक्षम तो रहे और बदले में किसी पुरस्कार या परिणाम की उम्मीद ना करे।

किसी परिस्थिति या इंसान को देवता ना माने

उम्मीदों के रंग परिस्तिथियो की पूजा करते हैं। मिसाल के तौर पर, आप ऐसा माने की आपके कपल रिलेशनशिप में, आपका साथी आपके लिए परफेक्ट मैच है, उसमे कोई दोष नहीं, लेकिन बीतते वकते के साथ जब आपका यह भ्रम टूट जाएगा, तब निराशा ही हाथ लगेगी।

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किसी व्यकित या परिस्तिथि का दैवतीकरण लोगो में हुए बदलाव को देखनेसे रोकता हैं। बाद में एक कड़वी सच्चाई देखने को मिलती है, जिसकी पीड़ा आपको सहनी पड़ती है। लोग बदलते हैं और बदलाव प्रकृति का नियम होता है। लेकिन आपको यह सब कुछ असामान्य लगता है और इसके लिये आप खुद को दोषी मानने लगते है, जिससे आप दुखी हो जाते है। आपको यह स्वीकारना चाहिए की आप कुछ बातो पर अपना नियंत्रण नहीं रख सकते। वस्तुओ या परिस्थतियो को भगवान् मानना बन्द करे, क्योंकि यही एक मार्ग हैं, जिससे आप वास्तव जिंदगी जीने लगते है।

हम सबमे खामियां होती हैं, कोई भी सर्वोत्तम नहीं होता

शायद आप विपरीत झुण्ड में ना हो और किसी को निराश ना किया हो। कई बार हमे बुरा लगता हैं क्योंकि हुम दुसरो से दोष रहित होने की उम्मीद रखते है। हम हमेशा दुसरो को बदलना चाहते है, न की अपने आप को। यही निराशा का कारण होता है।

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इस दुनिया में कोई भी सर्वोत्तम नही है। आपको उन लोगो को वे जैसे हैं वैसे ही स्वीकारना सीखे और उन्हें आप जैसे बनाने की कोशिश ना करे। जितना जल्दी आप ये करे, उतना आप के लिए बेहतर साबित होगा। तो, अगर कोई गलत है, तो ज्यादा मत सोचिये की ऐसा क्यों? और उसे स्वीकार करे। परिणामो के इंतज़ार की राह मत देखे: अगर आप कोई  उम्मीद  नहीं रखेंगे, तो आपको पछतावा भी नहीं होगा। जो भी कोई होगा या तो एक सुखद आश्चर्य होगा या फिर अप्रिय सबक।

दूसरों से बहुत ज्यादा उम्मीद करना गलत है। अगर आप निराश होने से ऊब चुके है, तो आपके बारे में दूसरे लोग क्या सोचते है यह देख पाएंगे, या फिर उनका स्वार्थी व्यवहार देखके आप तंग आ जाएंगे; बस उसी वक्त आप एक चीज़ करे- उम्मीदें रखना बंद करे।

आप सिर्फ एक ही व्यक्ति से उम्मीदें रख सकते है और वो व्यक्ति है खुद आप। दूसरे लोगो के साथ रहे और वे जैसे है वैसे ही उन्हें स्वीकार कर ले। अपनी ख़ुशी या गम के लिए उन्हें जिम्मेदार ना ठहराए, क्योंकि असल में वे जवाबदेह नहीं है।

उन रवैयों से दूर रहे जो आपको मर्यादा में बांधे और आपको अपने सपने पूरा करने से रोके। अपेक्षाये रखना छोड़ दे और असल जिंदगी में रहना सीखे, न की सपनो की दुनिया में रहे।

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