मैं, मेरा पैसा और मेरे संबंध

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Sukhdeep Singh

Sukhdeep Singh

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Passionate about playing with words. Sukhdeep is a Post Graduate in Finance. Besides penning down ideas, he is an expert online marketing consultant and a speaker.

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आपके दूसरों के साथ संबंध कैसे होंगे यह बात दो चीज़ों पर निर्भर करती है – पहली तो यह कि आपके नसीब मे क्या है और दूसरी यह कि आपकी जेब मे क्या है? कभी कभी मुझे आश्चर्य होता है, मेरा यह मिथक, मेरे, मेरे पैसे, और मेरे रिश्तों के बारे में कितना सच साबित हुआ है??

आज हर सुबह मैं अपनी पसन्दीदा हॉट चॉकलेट, एक कप कैपेचीनो के साथ एन्जॉय  करता हूँ। मुझे यह मिथक बकवास लगता है। इस मामले मे मैं खुले विचारों का था। तब अच्छी जिंदगी पाने के लिए संघर्ष कर रहा था और यही चाहता था कि पाव-रोटी और एक सस्ते जूस के डिब्बे से ज्यादा  कुछ और अच्छा खाने को मिले।

किसी ने सच ही कहा है कि, “अपनी पुरानी यादों को दफ़नाने और सोए हुए कुत्ते को नींद से ना जगाने मे ही भलाई है।” मैं इन उपदेशों से ऊब चुका था। हालांकि मैं बहुत कोशिश कर रहा हूँ, मैंने बहुत कुछ बदला भी है और अब मुझे लगता है कि मैं दिल से नहीं सोचता। पर मैं इन सबके बाद भी उसी पुरानी जिंदगी में रहना पसंद करता हूँ, जिसने सिर्फ़ घाव और निशान दिए है।

मेरी अब तक की जिंदगी मे, मैंने अलग अलग रंग-ढंग के लोगों को देखा, जिनके दिल भी अलग अलग किस्म के थे ।  मुझे आज भी वो बदसूरत  दिन याद हैं, जब इंसान और इंसानियत के बारे मे मेरे विचार ताश के पत्तों  के घर की तरह भिखर गए थे।

आज रिश्ते इतने भौतिकवादी हो गए हैं कि एक सगा भाई दूसरे सगे भाई पर मुकदमा ठोक रहा है और सगी बहनें एक दूसरे के खिलाफ षड़यंत्र रच रहीं हैं। अगर मैं अपने किसी  रिश्तेदार को बीएमडब्ल्यू में मिलता हूँ, तो मेरे लिए एक अलग ही आवभगत होगी। और अगर मैं दो-पहियें गाड़ी से सवारी करता हूँ, तो लोग मुझसे इस तरह से पेश आएँगे, जिसकी मैंने कभी उम्मीद भी नहीं की थी।

खून के रिश्ते हो या फिर बाहरी रिश्ते, पैसा और आपकी सामजिक स्थिति एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मैं जेब के आकार के बारे में बात कर रहा हूँ क्योंकि दिल का आकार आजकल कौन देखता है!

मुझे आजतक यह समझ में नहीं आया कि जब हम जानते हैं कि यह भौतिकवाद ही दुख का सबसे बड़ा कारण है, फिर हम इसका समर्थन क्यों करते है? शादी का समारोह, डेट, जन्मदिन की पार्टी, वैलेंटाइन डे, परिवार या ऑफिस की पार्टी, परिवार के साथ डिनर; अवसर चाहे कोई भी हो, हम उस पर जब तक लाखों खर्च नहीं करते, तब तक हमे ख़ुशी नहीं मिलती।

सच तो यह है कि हम दूसरों से या फिर अपने ही सगे-सम्बन्धियों से प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं। हमारी खुशियाँ उनकी हाथों में हैं। हम प्रशंसा के भूखे  हो गए हैं और एक दूसरे के प्रति प्यार को तो हम जैसे भूल ही गए हैं।

सच सच बतायेँ, क्या आप फाइव स्टार होटल में वही ख़ुशी महसूस करते हैं जो आप अपने पिता के साथ उस वक्त महसूस करते थे जब वे आपके लिए एक सड़क के किनारे से आइस-क्रीम खरीद कर लाते थे? बात सिर्फ स्वच्छता की नहीं हैं, क्योंकि हम सब इन फाइव स्टार होटलों के स्वच्छता मानकों के पीछे की सच्चाई भी जानते हैं। पर कड़वा ही सही पर सच यह है कि हम तो सिर्फ स्टेटस सिंबल के पीछे भागते है।

आख़िर हम जा किस तरफ रहें है? मैं अपना नाम जायदाद में चाहता हूँ, तभी मुझे प्यार और विश्वास मिलेगा। मैं चाहता हूँ कि मेरे रिश्तेदार मुझसे वीआईपी की तरह बर्ताव करें क्योंकि इसी से मुझे ख़ुशी मिलती है। मैं अपने विचार किसी के साथ शेयर करने से डरता हूँ, लेकिन अगर लोग मेरे फेसबुक स्टेटस पर कमेंट करें तो मुझे अच्छा लगता है। मैं इस फेसबुक स्टेटस के जरिये ये बताना चाहता हूँ कि मैंने कुछ किया है।

मैं लोगों को चिल्ला-चिल्ला कर बताना चाहता हूँ कि मुझे कितने उपहार और अधिकार मिले हैं। मैं किसी ऐसे व्यक्ति से टैग्ड नहीं होना चाहता जो मेरे आर्थिक दर्जे का ना हो, चाहे वो मेरा करीबी दोस्त हो या फिर मेरा भाई। अगर मेरे किसी पुराने दोस्त या रिश्तेदार की जिंदगी अच्छी नहीं चल रही है, तो फिर मैं उसे स्किप करना ही पसन्द करता हूँ क्योंकि मुझे डर है कि वह कही कुछ माँग ही ना ले।

अगर हम ऐसा कर रहे हैं तो यह गलत है। हमे लोगों को उनके भौतिकवादी सामानों से परखने के बजाय उनके मूल्यों और भावनाओं की सराहना करनी चाहिए। हम सब जानते है और मानते भी है कि वक्त बदलता रहता है और सफलता कभी स्थायी नहीं रहती।  “कौन मुझ पर ज्यादा खर्च करता है” इसके बजाय ये मायने रखता है कि, “बुरे वक्त पर कौन मेरे साथ था।”

भौतिकवाद, सहानुभूति की कमी, दूसरों से जुड़ना, दुःख इन सब चीजों का एक दूसरे से गहरा रिश्ता होता है।

मुझे एक और मिथक याद आता है,” एक हाथ जो विफलता के दौरान आपके आँसू पौछता है, उन हजारों हाथों की तुलना मे ज़्यादा बेहतर है जो आपकी सफलता में तालियाँ बजाते हैं।

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