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उम्मीदें निराशा की ओर धकेलती हैं और निराशा दिशाहीनता की ओर

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Sukhdeep Singh

Sukhdeep Singh

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Passionate about playing with words. Sukhdeep is a Post Graduate in Finance. Besides penning down ideas, he is an expert online marketing consultant and a speaker.

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माना कि ज़िन्दगी गुलाब के फूलों की सेज नहीं है, पर ज़िन्दगी खूबसुरत है। इस गहरे शब्दों वाली पंक्ति पर मुझे दूसरी कक्षा में एक चार्ट बनाने को कहा गया था। लेकिन, 40 साल की उम्र निकल जाने के बाद भी मैं इस पंक्ति में से “खूबसूरत” शब्द वाले हिस्से को खोज रहा हूँ।

सुबह के 7 बजे थे। रोज की तरह मैं आज भी बिस्तर से उठा, खुद के लिए चाय बनाई और टेलीविज़न लगाकर बैठ गया। फिर मैंने अपना मोबाइल फ़ोन चालू किया (मैं घर पहुँचते ही अपना मोबाइल फ़ोन बंद कर देता हूँ)। जैसे ही मैंने फ़ोन चालू किया, मेरे फ़ोन पर एक आटोमेटिक मैसेज आया, “37 मिस्ड कॉल्स।”

मेरी सुबह उदास करने के लिए यह एक मैसेज ही बहुत था। यह सभी कॉल्स मेरे एक मित्र ने की थी, जिसकी माँ को मैंने एक रात पहले ही अस्पताल में भर्ती करवाया था क्योंकि मैंने उसे बहुत ही दयनीय एवं दर्दनाक हालत में घर में फर्श पर गिरी हुई पाया था।

अपने दोस्त को फ़ोन करने से पहले ही मुझे महसूस हो गया था कि यकीनन उसकी माँ हमारे बीच नहीं रही है। जैसे ही मैंने उसे फ़ोन किया, उसने भी सामने से मुझे यही कहा। वह एक बच्चे की तरह सिसक रहा था और उसके मुंह से सिर्फ तीन शब्द निकले, “वो नहीं रही।”

मैंने अपने ऑफिस में फ़ोन किया और उन्हें उस दिन ऑफिस न पहुँच पाने की मुश्किल और कारण के बारे में बताया। मेरे दोस्त के लिए यह बहुत बड़ा झटका था। अभी कुछ ही साल पहले उसने अपने पिता जी को खोया था, और अब उसकी माँ भी उसे छोड़ गई थी। उसके पिता जी के देहांत के बाद से ही उसकी माँ अपना मानसिक संतुलन खो बैठी थी और हिंसक हो गई थी।

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मुझे जहा तक याद पड़ता है, मैंने उसकी माँ को उसके पिता जी के देहांत के बाद से कभी हँसते हुए नहीं देखा था। उसके पिता जी की मृत्यु से पहले उसकी माँ मदर टेरेसा जैसी थी। उसकी परोपकार की आदत के चलते आसपास के लोग उसकी बहुत इज़्ज़त किया करते थे।

चाहे कोई भिखारी हो, बेघर व्यक्ति हो, गरीब हो या वंचित इंसान हो; उसकी माँ हमेशा सभी की मदद किया करती थी। वह अपनी परोपकारी मानसिकता के लिए जानी जाती थी।

दिन का कोई भी समय हो, वह हमेशा मदद के लिए तैयार थी। लेकिन, जब विपत्तियों ने उसे घेरा, तो मैंने इसी औरत को मदद के लिए रोते हुए भी देखा।

मुझे कहने में कोई हर्ज नहीं है कि मेरे दोस्त की पत्नी एक बहुत ही घटिया शख्सियत थी। जिस दिन से वह उनके परिवार का हिस्सा बनी थी, मैंने कभी उसे अपने दोस्त की माँ से बात करते नहीं देखा था।

दोस्त के दुबई चले जाने के बाद, मैं उसी के कहने पर उसकी माँ को मिलने अक्सर उसके घर जाता रहता था। उसकी माँ ने एक बार उसके साथ हो रहे बुरे बर्ताव के बारे में मुझसे बात भी की थी। उसने मुझे कहा था कि उसकी बहु उसे बहुत तंग करती है।

उसने मुझे कहा था कि, अगर मेरी उसके बेटे से बात हो, तो मैं उसे यह जरूर बताऊँ कि पिछले एक हफ्ते से वह उसी बिस्तर पर खा रहा है, सो रही है और मल-मूत्र कर रही है। उसकी बहु ने पिछले एक हफ्ते से उसके बिस्तर की चादर भी नहीं बदली थी। उसने मुझ से कहा कि उसे अपनी बहु से ऐसे अमानवीय बर्ताव की कतई उम्मीद नहीं थी।

उसकी माँ ने मुझसे कहा कि जिस बेटे को उन्होंने अपना पूरा संसार दे दिया, जिस बेटे पर उन्होंने पूरा जीवन लुटा दिया, उससे भी इतने स्वार्थी बर्ताव की उम्मीद नहीं थी। मेरे मित्र की मां ने मुझे यह संदेश मेरे मित्र तक पहुंचाने के लिए कहा।

उन्होंने ने मुझे कहा कि मैं उसे “माँ के दूध” का कर्ज चुकाने को कहूं। मेरे मित्र की माँ ने बहुत भरे मन से मुझे कहा कि उसे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि उसका बेटा उसकी देखरेख खुद न करके उसके लिए एक नर्स रखकर, अपने बेटे होने के सभी फर्जों से अपना पल्ला झाड़ लेगा और खुद एक मेहमान की तरह उससे मिलने आएगा।

मुझे पता है कि मेरे बेटे के कुछ सपने है। लेकिन, इस बूढ़ी माँ का सपना वह एक बेटा ही है। जब इस दुनिया से जाने का समय आए, तो मेरा बेटा मेरे पास हो, यही मेरी ज़िन्दगी का एकमात्र सपना है। मुझे लगता है कि मैं यह सपना अपनी आँखों में लेकर ही इस दुनिया से चले वाली हूँ।

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मेरे मित्र की माँ ने मुझे कहा कि अगर मेरी उसे बेटे से बात हो, तो मैं उससे यह जरूर पूछूं कि क्यों उसने अपनी ही माँ को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया? और अब जब यह सीढ़ी बेकार हो गई है, तो इसे एक अंधेरी कोठरी में रखा दिया है, जहाँ उस पर मकड़ी के जाले और छिपकली की शौच लगी रहती है। एक ऐसी सीढ़ी, जिसे उसने वहां पहुंचने के लिए इस्तेमाल किया, जहाँ वह आज है। मुझे नहीं लगता कि उसने मेरे उस खून की कीमत अदा की है, जो उसने मेरी छाती से दूध के रूप में चूसा था।

मुझे अपने मित्र की माँ की आवाज में एक दर्द महसूस हुआ था। मैं ईश्वर की कसम खा कर कहता हूँ कि उसकी माँ की हर बात से मुझे उस दर्द का एहसास हो रहा था, जो शायद उसकी माँ महसूस कर रही थी। यह एक ऐसा दर्द था, जो केवल वही व्यक्ति समझ सकता है, जिसका सब कुछ उसी की आँखों के सामने छीन रहा हो। शायद, मेरे मित्र की माँ पर उम्मीदों के टूटने का भोझ भारी पड़ रहा था। डिप्रेशन से लेकर हिंसक दौरों तक और हिंसक दौरों से मौत तक, मैंने अपने मित्र की माँ को हर रोज पल-पल मरते देखा था।

मैंने इस पूरी बात को अपने दोस्त के साथ साझा किया और शायद वह आखिरी दिन था, जब उसने एवं उसकी पत्नी ने मुझे कुछ शिष्टाचार दिखाया। दोस्त के बर्ताव से, मुझे थोड़ा धक्का जरूर लगा, लेकिन उसकी पत्नी जैसी घटिया औरत की मुझे रत्ती भर भी परवाह नहीं थी। उन दोनों से हुई कहा-सुनी के बाद, मैं कभी उनके घर नहीं गया।

इस बात को कुछ दिन बीत गए थे और फिर एक दिन मुझे न जाने क्यों, अपने मित्र की माँ की चिंता होने लगी थी। मैं सहज महसूस नहीं कर रहा था और मैं अपने मित्र की माँ से मिलने चला गया। मैंने सोचा, अगर घर न भी जा पाया, तो आसपास के लोगों से ही हाल चल पूछ लूंगा।

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आसपास के लोगों में मुझे बताया कि बहु तो कई दिनों से घर ही नहीं लौटी है और बूढ़ी औरत भी कही नज़र नहीं आ रही है। मुझे कुछ बहुत बुरा घटने की आशंका होने लगी थी। जब रहा नहीं गया, तो मैंने कुछ गली वालों की उपस्थिति में चाबी वाले को बुलवा कर, घर का ताला खुलवा लिया।

घर के अंदर जाते ही मैंने देखा कि उसकी माँ को फर्श पर बेसुध हो कर गिरी हुई है। मित्र की माँ को फर्श पर गिरा पड़ा देखकर मेरी आँखों में आंसू आ गए। मैंने उसे अस्पताल में भर्ती कराया और अपने दोस्त को दुबई में फोन कर दिया। उसके आने पर, मैंने उसे बिना कुछ कहे वहां से चले जाना ही बेहतर समझा।

मेरे दोस्त की माँ, शायद आपने बेटे को एक नजर देखने के लिए ही जिन्दा थी। जैसे ही मैं वहां से वापिस आया, उसके कुछ घंटों बाद ही उसकी माँ इस दुनिया से चली गई थी।

क्या आपके पास भी कोई ऐसी कहानी है? हमसे साझा करें।

मैं सोच रहा था, हम लोग चीजों से उम्मीदें रखते ही क्यों हैं? जब हमारी उम्मीदें पूरी नहीं होती, तो हमें बुरा क्यों लगता है? जब कोई ऐसा इंसान धोखा देता है, जिसे आप बहुत चाहते हैं, तो हमें बुरा क्यों लगने लगता है और हमेशा ऐसे ही इंसान क्यों धोखा देते हैं, जिन्हें हम सबसे ज्यादा प्यार करते हैं या जिन पर हम सबसे अधिक भरोसा करते हैं?

मैंने कई लोगों को यह कहते हुए सुना है कि जहाँ हमें सबसे ज्यादा उम्मीद होती है, वही हमें निराशा का सामना करना पड़ता है। जिस इंसान से हमें सबसे ज्यादा उम्मीद होती है, वह हमारी उम्मीदों पर पानी जरूर फेरता है। शायद यही वजह थी कि मेरे मित्र की मां शरीर छोड़ने से पहले ही मानसिक रूप से स्वर्गवासी हो चुकी थी।

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