सच्ची कहानी – बुरे वक़्त में आप लोगों के असली रंग को देख पाते हैं

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बुरा वक़्त भी एक छाननी की तरह होता है, जो अपने और बेगानों को बारीकी से छानने में आपकी बहुत मदद करता है और इस वक़्त में आप लोगों के असली रंग को देख पाते हैं। इसके ख़त्म होने पर आप यह भी समझ जाते हैं कि अच्छा वक़्त आने पर आपको किन लोगों का साथ ज़िन्दगी भर नहीं छोड़ना है। यह कहानी एक ऐसे ही इंसान की है, जिसने हमेशा दूसरों के लिए अपने सपनों की बलि दी और जब उसे बुरे वक़्त ने घेरा, तो उन अपनों ने उसी की बलि दे दी। सच कहा है किसी ने कि इंसान दुनिया से लड़ सकता है, लेकिन अपनों से नहीं।

बहुत भारी मन से मैंने गाड़ी स्टार्ट की और गाड़ी का ए.सी न चला कर अपनी तरफ की खिड़की नीचे कर ली थी। दरअसल, मैं अपने आंसू छुपाना चाहता था। मैं गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे अपने ही घर के लोगों को यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि मेरी आँखों में पानी का कारण रास्ते की धूल है, उनके द्वारा कही गई बातें नहीं। मन ही मन, मैं सोच रहा था कि जिन अपनों के लिए मैं दुनिया से लड़ता रहा, आज उन्ही अपनों ने मुझे ऐसे मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया, जहाँ हर रिश्ता मतलब से भरा लग रहा था।

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मैं महसूस कर रहा था कि जिस दिन मुझे व्यापार में नुकसान की वजह से उसे बंद करना पड़ा और अपने छोटे-मोटे खर्चे के लिए भी, घर के सदस्यों पर निर्भर होना पड़ा, उसी दिन से घर वालों का रवैया मेरे प्रति बहुत बदल सा गया था। मैं जिन अपनों पर अपनी मेहनत की पाई-पाई बिना सोचे खर्च कर दी थी, आज उन्होंने ही मुझे एक-एक रूपये के लिए ताने देना शुरू कर दिया था।

इस दुविधा में घिरा हुआ, मैं गाड़ी निश्चित रफ़्तार से बहुत धीमी चला रहा था। तभी पास से एक ट्रक बहुत ही तेज़ रफ़्तार से गुज़रा और उसने मेरी सोच की मदहोशी तोड़ी। एक दम से गाड़ी की हैंड ब्रेक खींचनी पड़ी।

इस पर पिछली सीट पर बैठे मेरे अपनों ने भी अपनी चुपी तोड़ी। “मरने का इतना ही मन हो रहा है, तो पहले हमें घर तक सही-सलामत पहुंचा दो। जब से पैदा हुए हो, बस नुकसान पर नुकसान ही करवा रहे हो।”

अब मैं पूरी तरह से टूट चूका था। क्या कभी आपके अपने भी आपके मरने की कामना कर सकते हैं। एक इंसान अपने परिवार में आकर दुनिया का हर दुःख भूल जाता है। लेकिन, अगर वही परिवार आपसे एक बोझ की तरह पीछा छुड़वाने पर आ जाए, तो किसी की भी इंसानियत का मर जाना कोई नई बात नहीं होगी।

मैंने अपने अच्छे समय में, मेरे अपनों को हर संभव ख़ुशी देने की मुमकिन कोशिश की थी। मैंने पैसों से ज़्यादा रिश्तों को अहमियत दी थी। अपने बैंक बैलेंस को बढ़ाने से ज़्यादा, अपने परिवार के लोगों की खुशियों का बैलेंस बढ़ाना मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण था। उसी को बढ़ाने के चक्कर में मैंने कभी खुद के बारे में नहीं सोचा और जो कुछ भी कमाया, बिना सोचे अपनों पर लगा दिया।

खैर, आज जब मैं सब कुछ खो बैठा हूँ, तो मुझे यह मेरी ज़िन्दगी की सबसे बढ़ी गलती लग रही है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ कि यह मेरी बदकिस्मती है या मेरी खुशकिस्मती। क्या मैं इस बात पर दुःख प्रगट करूँ कि मेरे अपनों ने ही मुझे ठुकरा दिया है, या इस बात पर ख़ुशी महसूस करूँ कि अब मुझे उनका असली रंग पता चल गया है। शुरूआत में, मेरे लिए यह समझ पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था कि एक इंसान जिसे कुछ साल पहले उसके सगे-संबंधी अपना आदर्श मानते थे, आज उसी इंसान को पहचानने से भी क्यों इंकार कर रहे हैं?

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जब मुझे व्यापार में नुक्सान हुआ और मेरी आर्थिक हालत खस्ता हो गई, उस वक़्त मेरे अपनों ने मुझसे अपने नाते तोड़ने शुरू कर दिए। यह जानते हुए भी कि मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, मुझसे घर की हर चीज़ में हिस्से डालने को कहा जाता था, फिर चाहे वह घर का राशन हो या मेरे बीमार बच्चे का दूध। यहाँ तक कि बीमारी में भी मुझे यह सुनाया गया कि अब मुझे खुद ही अपना खर्च सहना पड़ेगा।

मुझे घर से निकाल देने की हर संभव कोशिश की गई। कभी जज़्बाती करके और कभी गाली-गलोच करके, हर वक़्त बस मुझसे यही कहा जाता था कि मैं एक पनौती हूँ, जो उनकी खुशियों पर ग्रहण की तरह हूँ। मेरे अपने, दूसरों के सामने खुद को महान और मुझे बेचारा साबित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। कुछ समय बाद तो मुझे भी यह लगने लगा था कि शायद मैं ही एक नाकारा इंसान हूँ और मुझे दी जाने वाली हर मदद एक एहसान से ज़्यादा कुछ नहीं है।

मैं जिससे भी अपना दर्द बांटता था, वह यही कहता था कि मेरे अपनों ने मेरे साथ यह सलूक इसलिए किया क्योंकि वह मुझे खुद के पैरों पर दुबारा खड़ा हुआ देखना चाहते थे। ऐसा हो भी सकता है। पर, मैं यह भी सोचता हूँ कि किसी हादसे के बाद खड़ा होने में थोड़ा समय लगता है और उस समय इंसान को उसके अपनों के सहारे की ज़रूरत होती है। उस वक़्त अगर उससे बेगानों जैसा बर्ताव किया जाए, तो यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे किसी की टांग पर ताज़ा-ताज़ा प्लास्टर लगा हो, और उससे फ़िल्मी अंदाज़ में अगले ही पल दौड़ने की उम्मीद की जाए।

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उस रोज़ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। मुझे अपना ही घर छोड़ देने को कह दिया गया था और पैतृक सम्पति में से मेरे हिस्से के रूप में मुझे एक बस्ती में घर दिया जा रहा था, जो इंसानों के लिए एक नर्क से ज़्यादा नहीं था। जब इसके विरोध में मैंने अपना पक्ष रखा, तो मुझसे दो-टूक शब्दों में कहा गया कि मैं इसी नर्क के काबिल हूँ।

उस दिन मेरे सब्र का बांध भी टूट गया था और मैंने भी सभी रिश्तों का गला घोट दिया। मैंने अपनी पत्नी से सामान बाँध कर तैयार रहने को कहा क्योंकि मैं अपना घर छोड़ देने का मन बना चूका था। जैसे-तैसे मैं अपने घर पहुंचा और सीधा अपने कमरे में चला गया। उस रोज़ मेरे बच्चे को 103 के करीब बुखार था और बाहर रात भी काफी ठंडी हो चुकी थी। लेकिन, रिश्तों की अर्थी का बोझ इतना ज़्यादा हो गया था कि मुझे एक पल भी उसे और सह पाना मुश्किल हो रहा था।

उस रात घर पर खूब हंगामा हुआ और रात के करीब 2 बजे, मैंने अपने एक दोस्त को बुलाया। रात को हम उसके घर पर ठहरे। फिर अगली सुबह, मैंने अपने अमेरिका में रह रहे दोस्त से इस बारे में बात की और उसने मुझे उसी के एक खाली पड़े फ्लैट में रहने को कहा। कुछ दिनों के बाद, मैंने अख़बार में एक इश्तहार देखा, जो मुझे चल-अचल सम्पति से बेदखल करने के बारे में था।

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इस बार मुझे कोई धक्का नहीं लगा और मैं खुश था कि मैं गले-सड़े रिश्तों की दलदल से बाहर आ गया हूँ। 2 साल वहां रहने के बाद, मैं भी अपने बीवी बच्चे के साथ उसी मित्र के पास अमेरिका आ गया। अब मैं यहाँ एक बहुत ही बड़ी मोबाइल कंपनी में बतौर इंजीनियर नियुक्त हूँ और बहुत खुश हूँ। मेरी ज़िन्दगी ने फिर से पहले जैसी रफ़्तार पकड़ ली है।

कुछ रोज़ पहले, मुझे यहीं अमेरिका में मेरा वही दोस्त मिला, जिसके घर में उस एक रात को रुका था। बातों ही बातों में मुझे उसने बताया कि उसके अमेरिका आने से पहले कुछ ही दिन पहले, उसे एक शाम को बाज़ार में मेरे अपने मिले थे और मेरे बारे में सवाल कर रहे थे। खैर, उस वक़्त उसे भी पता नहीं था कि मैं यहाँ अमेरिका में हूँ। उसने मुझे मेरे किसी अपने का नंबर भी दिया, और वह कागज़ मैंने वहीं कचरे में फेंक दिया।

अब कोई मुझे कुछ भी कहे, मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैं उन सभी रिश्तों को दफ़न कर चूका हूँ और मुझे दुबारा वही ज़िल्लत नहीं चाहिए।

इतना सब होने के बाद मैं यह तो समझ ही गया हूँ, क्यों लोग कहते हैं कि रिश्ते भौतिकवादी हो चुके हैं। पैसा और रिश्ते, एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए हैं। कोई भी आपके साथ उस वक़्त नहीं रहना चाहता, जब आप खुद तूफानी समुद्र में घिर चुकें हों। लेकिन आपको उन लोगों का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए, जो ऐसे तूफान में भी आपके साथ हैं।